इस रूप संसार के रचयिता, संचालक, रक्षक व स्वामी ब्रम्ह ने प्रत्येक रूप को किसी प्रयोजन के
उद्देष्य से सृजित किया है । इसलिये प्रत्येक रूप का यह दायित्व है कि मालिक के
हाथों के यंत्र के रूप में वह अपने को मालिक की सेवा में प्रस्तुत करे ता कि वह
मालिक उस रूप से अपना वह कार्य सम्पादित करा सके जिसके निमित्त मालिक ने उस रूप को
सृजित किया है । दूसरे शब्दों मे “अहंकारशून्य” दशा में व्यक्ति अपने को मालिक के
सामने उसकी सेवा के लिये तत्पर हो । गुरू के उपदेश के अनुसार यही अपेक्षित स्वरूप
है ।
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