शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

निमित्तमात्रम्

कर्म – कर्मफल – कर्तव्य की स्थिति को व्यक्त करने के लिये श्रीमद्भागवद्गीता के ग्रंथकार ने “निमित्तमात्रम्” शब्द का प्रयोग किया है जिसका शाब्दिक अर्थ बनेगा “अवसर मात्र” । तर्क प्रश्न उपस्थित करता है कि यदि संसार मात्र पूर्वनिर्धारित का ही निरूपण करता है तो मनुष्य का कर्तव्य क्या है ? धर्म ग्रंथ कहते हैं कि ईश्वर अपने बनाये जीवों के प्रति कृपालु है और उन्हे प्यार करता है । तो क्या ईश्वर अपनी मनमानी इच्छाओं से संसार का संचालन करता है ? कंचिद नहीं । यह कर्म और कर्मफल होते हैं जो संसार में घटित हो रही प्रत्येक घटना का निर्धारण करते हैं । प्रश्नगत होता है कि जीव उपस्थित कर्म को किन भावों से ग्रहण करता है । ग्रंथकार इंगित करना चाहता है “अहंकार शून्य” दशा । व्यक्ति द्वारा उपस्थित कर्म को यथा स्वरूप ग्रहण करना अपेक्षित भाव होता है ।     

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