मनुष्य की तर्क पर आधारित सोच में, उसका अपना एक अलग अस्तित्व एवं उसके मन
द्वारा सृजित उसकी अपनी इच्छाये, फिर उन्ही इच्छाओं की पूर्ति में
किये गये कर्म. यह सभी मिलकर कर्मफल भोग की बाध्य
परिस्थिति मनुष्य के जीवन का स्वरूप बना हुआ है । इन्ही समस्त बातों को यदि एक
शब्द द्वारा व्यक्त करना हो तो कहा जायेगा “अज्ञान” । अज्ञान दो भ्रामक बातो का योग है (1) स्वयं का अलग अस्तित्व बोध जिसे
अहंकार कहा जाता है (2) स्वयं की इच्छायें ।
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