दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे
व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि जिस प्रकार नदियों की प्रचण्ड धारायें समुद्र
की ओर अपने स्वाभाविक क्रम में चली जाती हैं उसी प्रकार इस संसार के समस्त वीर
नायक आपके मुख के प्रचण्ड धधकती ज्वाला में प्रवेश करते जा रहें हैं ।
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