दिव्य स्वरूप के वृतांत को आगे
व्यक्त करते हुये अर्जुन कहता है कि स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का सम्पूर्ण स्थान
तथा आकाश के सम्पूर्ण विस्तार में आप पूर्णतया व्याप्त हैं, हे सर्वव्यापी सनातन सत्य आपके इस
आश्चर्यजनक एवं भयावह स्वरूप को देखकर तीनो लोक थरथराया है ।
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