अचेतन प्रकृति चेतन ब्रम्ह की चेतना
से प्रकाशित होती है । वह क्रियाशील हो जाती है । माया की महिमा से अहंकार का उदय
होता है । जीव सृजित हो जाता है । वह इस नाम-रूप-धारी संसार में भ्रमण करने लगता है
। कंचिद किसी काल उसे अंधकार (भ्रम) का बोध हो जाता है । वह प्रकाश (सत्य) की तलाश
को उन्मुख हो जाता है । उसमें, ज्ञान 1 से ज्ञान 5 पर्यंत, गुरू द्वारा गणना कराये गये 20 लक्षणों का
उदय होगा । इन्हे ही गुरू नें ज्ञान बताया है ।
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