शुक्रवार, 5 मई 2017

ज्ञान का सार

अचेतन प्रकृति चेतन ब्रम्ह की चेतना से प्रकाशित होती है । वह क्रियाशील हो जाती है । माया की महिमा से अहंकार का उदय होता है । जीव सृजित हो जाता है । वह इस नाम-रूप-धारी संसार में भ्रमण करने लगता है । कंचिद किसी काल उसे अंधकार (भ्रम) का बोध हो जाता है । वह प्रकाश (सत्य) की तलाश को उन्मुख हो जाता है । उसमें, ज्ञान 1 से ज्ञान 5 पर्यंत, गुरू द्वारा गणना कराये गये 20 लक्षणों का उदय होगा । इन्हे ही गुरू नें ज्ञान बताया है । 

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