संचित वासना से कर्म का सृजन-चक्र प्रारम्भ होता है । विवेक में विचार
बनकर उदय होता है । मस्तिष्क में इच्छा का रूप धारण करता है । अहंकार उसे सम्पादन
प्रदान करता है । कर्म-सिद्धांत के अनुसार यह कर्म कर्मफल
की परिधि में है । इसके विपरीत आत्मा साक्षी है । कर्ता प्रकृति है । गुण प्रकृतीय
रचना हैं । इस स्वरूप को धारण करके व्यक्ति की इंद्रियाँ अपने विषयों के साथ
परस्पर करेंगी, कर्म होगा, परंतु वह कर्मफल की परिधि में नहीं होगा । यह जीवनमुक्त दशा
होगी ।
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