गुरू का उपदेश प्रशस्थ करता है कि
ब्रम्ह समस्त रूपों का आश्रय है फिर भी उसका कोई रूप नहीं है । वह सब कुछ सुनता है, परंतु इन चर्म कर्णों से नहीं, वह सब कुछ देखता है परंतु इन मानव आखों से
नहीं, वह सब कुछ जानता है, परंतु इस सीमित मस्तिष्क से नहीं । ब्रम्ह
की व्यापकता को अध्यारोप और अपवाद द्वारा व्यक्त किया जाता है । वह अव्यक्तनीय है
।
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