अद्वैत वेदांत यही प्रशस्थ करता है
कि प्रकृति कर्ता है परंतु अ-चेतन है और पुरुष (आत्मा) चेतन है परंतु अ-कर्ता है ।
आत्मा प्रकृति के कार्यों की दृष्टा है । वह ब्रम्ह स्वरूप है । माया के आवरण
शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति कर्ता और साक्षी के मध्य भेद को नहीं जान पाता है ।
यही अज्ञान का स्वरूप है ।
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