व्यक्ति में अपेक्षित विशेषताओं की
गणना को आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि आत्मज्ञान के
लिये सतत् सचेष्ट रहना, सत्य की अनुभूति के लिये
अंतर्दृष्टि – इसे (ज्ञान 1 से 5 पर्यन्त) (सच्चा) ज्ञान कहा जाता है और इससे
भिन्न जो कुछ भी है वह अज्ञान है ।
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