गुरुवार, 11 मई 2017

विरोधाभास की भाषा

ब्रम्ह को व्यक्त करने के लिये विरोधाभास वाले शब्दों का प्रयोग करना एक पद्धति है । यथा बिना किसी संसर्ग के फिर भी प्रत्येक में, अ-चल फिरभी चलता हुआ, सभी से दूर फिर भी सन्निकट, अ-विभाज्य फिर भी विभाजित आदि । ब्रम्ह प्रकृति से अछूता भिन्न स्वत: अस्तित्व है । इसलिये ज्ञान के कोई भी प्रकृतीय साधन उसे व्यक्त करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं । उसे ग्रहण किया जा सकता है परंतु व्यक्त नहीं किया जा सकता है ।

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