शुक्रवार, 19 मई 2017

भिन्नमत

भगवद्गीता में पुरुष और प्रकृति को एक ही ब्रम्ह की उच्चतर और निम्नतर प्रकृति के रूप में लिया गया है । अद्वैत वेदांत में ब्रम्ह को सत चित आनंद बताया गया है । जीव में वर्तमान आत्मा और संसार में फैले हुये रूप, दोनो ही एक ब्रम्ह से ही सम्भव हुये हैं, परंतु माया के प्रभाव से कोई देख नहीं पाता है । 

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