भगवद्गीता में पुरुष और प्रकृति को
एक ही ब्रम्ह की उच्चतर और निम्नतर प्रकृति के रूप में लिया गया है । अद्वैत
वेदांत में ब्रम्ह को सत चित आनंद बताया गया है । जीव में वर्तमान आत्मा और संसार
में फैले हुये रूप, दोनो ही एक ब्रम्ह से ही सम्भव
हुये हैं, परंतु माया के प्रभाव से कोई देख
नहीं पाता है ।
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