बुधवार, 10 मई 2017

क्षेत्रज्ञ परमात्मा

महाभारत ग्रंथ में ऐसा वर्णन आता है कि आत्मा जब प्रकृतीय गुणों के साथ अपने को युक्त प्रदर्शित करती है तो उसे क्षेत्रज्ञ कहा जाता है जबकी आत्मा अपने मौलिक स्वरूप अर्थात् दृष्टा रूप में अपने को प्रदर्शित करती है तो उसे परमात्मा बताया जाता है । वेदांत में इस भिन्नता का कारण कहा गया है कि माया की आवरण शक्ति के प्रभाव से यह सम्भव होता है । इसे ही अज्ञान बताया जाता है । इस अज्ञान का फल होता है कि आत्मा दृष्टा स्वरूप से च्युत हो कर्ता स्वरूप ग्रहण कर लेती है ।  

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