रविवार, 18 जून 2017

त्रिगुणातीत

आत्मा कंचिद अपने को प्रकृति के गुणों के साथ सम्बद्ध चिन्हित करती है तो वह शरीर, मस्तिष्क और चेतना को अहंकार से जनित इच्छापूर्ति के लिये प्रयोग करने लगती है । यह उसका बंधन है । इस बंधन के फल से वह जीवन और मृत्यु के चक्र में अनवरत भ्रमण करती है । इस बंधन से मुक्ति के लिये उसे अपने को इन गुणों से ऊपर उठाना होगा अलग करना होगा । ऐसी दशा प्राप्त होने पर सत्व चैतन्य की ज्योति में पर्णित हो जायेगी, रज़स् वैदिक कर्मकाण्ड में पर्णित हो जायेगी और तमस् मानसिक शांति में पर्णित हो जायेगी ।  

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