आत्मा कंचिद अपने को प्रकृति के
गुणों के साथ सम्बद्ध चिन्हित करती है तो वह शरीर, मस्तिष्क और चेतना को अहंकार से जनित इच्छापूर्ति के लिये
प्रयोग करने लगती है । यह उसका बंधन है । इस बंधन के फल से वह जीवन और मृत्यु के
चक्र में अनवरत भ्रमण करती है । इस बंधन से मुक्ति के लिये उसे अपने को इन गुणों
से ऊपर उठाना होगा अलग करना होगा । ऐसी दशा प्राप्त होने पर सत्व चैतन्य की ज्योति
में पर्णित हो जायेगी, रज़स् वैदिक कर्मकाण्ड में पर्णित
हो जायेगी और तमस् मानसिक शांति में पर्णित हो जायेगी ।
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