सोमवार, 26 जून 2017

सर्वद्वारेषु देहेअस्मिन

ज्ञान की अनुभूति को शरीर की प्रकृति में पिरोहित हो जाने की दशा होने पर प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय से उसकी अभिव्यक्ति होने लगेगी । ज्ञान के जिज्ञासु के लिये गुरू की यही अनुशंसा है कि ज्ञान व्यक्ति का जीवनस्व-रूप बन जाना चाहिये । शरीर की प्रकृति ही आत्मबोध से ओत्प्रोत हो जाय । ऐसी दशा होने पर ज्ञान उसके शरीर के प्रत्येक आचरण में प्रस्फुटित होने लगेगा । 

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