ज्ञान की अनुभूति को शरीर की
प्रकृति में पिरोहित हो जाने की दशा होने पर प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय से उसकी
अभिव्यक्ति होने लगेगी । ज्ञान के जिज्ञासु के लिये गुरू की यही अनुशंसा है कि
ज्ञान व्यक्ति का जीवनस्व-रूप बन जाना चाहिये । शरीर की
प्रकृति ही आत्मबोध से ओत्प्रोत हो जाय । ऐसी दशा होने पर ज्ञान उसके शरीर के
प्रत्येक आचरण में प्रस्फुटित होने लगेगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें