शाश्वत जीवन आत्मा को ब्रम्ह में
विलीन होने की स्थिति नहीं है अपितु आत्मा जो की प्रकृतीय मोंह में आसक्त स्थिति
में है उसे स्वतंत्र ब्रम्ह स्वरूप की स्थिति में स्थापित होकर प्रकृतीय मोंह से
मुक्त होने की दशा है । इस दशा को प्राप्त होने पर आत्मा संसार के व्यवहारिक सुख
और त्रास की स्थितियों से ऊपर उठकर अविरल आनंद की स्थिति को भोग करता है । वह
स्वयं आनंद स्वरूप है ।
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