समस्त अस्तित्व ब्रम्ह की ही
अभिव्यक्ति है । ब्रम्ह विश्व का बीज़ है । इस संसार के प्रसंग में वह “हिरण्यगर्भ”
विश्वात्मा बन जाता है । गुरू के कथन का अर्थ करते हुये आदिशंकर का कहना है “मैं
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को सन्युक्त करता हूँ जिससे हिरण्यगर्भ का जन्म होता है और
उससे सब प्राणी उत्पन्न होते है” । यह संसार सीमित प्रकृति पर असीमित ब्रम्ह की
लीला है ।
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