शनिवार, 10 जून 2017

समानधर्मिता

इस समस्त रूप संसार में, ब्रम्ह ने अपने को, समस्त जीवों में तथा समस्त रूपों में विस्तरित कर दिया है । समस्त रूप और नाम सत्य ब्रम्ह के ऊपर अध्यास हैं । समस्त जीव निर्जीव प्रकृति से बने हैं परंतु ब्रम्ह की छाया से प्रकाशित होकर सजीव हो गये हैं । जीव की चेतनाभूति उसकी भ्रांति होती है । सत्य आत्मा मात्र साक्षी होता है । माया के प्रभाव से यह भ्रांति और सत्य के मध्य भेद आवरण से ढका होता है । यही अज्ञान होता है । इसी आवरण के क्षय से, आत्मा साक्षी स्वरूप में जो कि स्वयं ब्रम्ह हैं, प्राप्त हो जाता है । 

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