भगवद्गीता
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
राजसिक तप
गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो तप सत्कार
,
सम्मान या प्रतिष्ठा पाने के लिये किया जाता है या प्रदर्शन के लिये किया जाता है
,
वह राजसिक तप कहलाता है । यह अस्थिर और अस्थायी होता है ।
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