असुरीय स्वभाव वाले लोगोके विषय में
बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि इसलिये क्या करना चाहिये
और क्या नहीं करना चाहिये, इसके निर्धारण के लिये तू शास्त्र
को ही प्रमाण मान । शास्त्र में बताये गये नियमों को जानकर तुझे इस संसार में अपना
काम करते जाना चाहिये ।
इस प्रकार दैवीय और असुरीय सम्पदाओं
का योग नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
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