कर्म का त्याग नहीं बल्कि कर्म को किया जाय परंतु किसी फल को
पाने के लिये नही यह सन्यास है । इस सन्यास की स्थिति को पाने के लिये गुरू ने
बताया कि समस्त कर्मों को मुझे अर्पित करके करो । इस अर्पण का फल होगा कि तुम्हे
कर्म के फल से मुक्ति मिल जावेगी क्योंकि तुमने कर्म को मेरी सेवा में किया है ।
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