आचरण की त्रुटियाँ प्रकृतीय मोंह से उत्पन्न होती हैं । कंचिद
जो व्यक्ति ब्रम्ह को समर्पित भाव से सदा रहता है तो ऐसी दशा में उसके कृतों का
संचालन स्वयं ब्रम्ह करता है । ऐसे व्यक्ति के द्वारा कृत कर्म सदैव त्रुटियों से
मुक्त रहते हैं । उसके पतन की सम्भावना नहीं रह जाती है ।
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