गुरुवार, 14 जुलाई 2016

त्रुटिरहित ब्रम्ह

आचरण की त्रुटियाँ प्रकृतीय मोंह से उत्पन्न होती हैं । कंचिद जो व्यक्ति ब्रम्ह को समर्पित भाव से सदा रहता है तो ऐसी दशा में उसके कृतों का संचालन स्वयं ब्रम्ह करता है । ऐसे व्यक्ति के द्वारा कृत कर्म सदैव त्रुटियों से मुक्त रहते हैं । उसके पतन की सम्भावना नहीं रह जाती है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें