गुरू ने चर्मोत्कर्ष उपलब्धि के लिये अभ्यासी को अपने समास्त
ज्ञानेंद्रियों को मर्यादित आचरण का अभ्यासी बनाने के लिये किये गये उपदेश में बराबर
मुझपर एकाग्र करो, मेरा ध्यान करो, मेरेप्रति समर्पित जैसे शब्दों का प्रयोग
किया है यह समस्त अभिव्यक्ति मात्र लक्षणात्मक है । उनका समस्त उपदेश अभ्यासी को
ब्रम्ह पर एकाग्र करने के लिये है । इन समस्त प्रयत्नों का फल होगा कि अभ्यासी
योगेश्वर के समान स्थिति को प्राप्त कर सकेगा ।
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