ब्रम्ह की निम्नतर प्रकृति और उच्चतर प्रकृति की परस्पर क्रिया
एवं प्रतिक्रिया का स्थल यह रूप संसार है । उच्चतर प्रकृति निरंतर निम्नतर प्रकृति
के मोंह में आसक्त है । फलत: यह त्रास भोग का जीवन मृत्यु का चक्र निरंतर चलता ही
जा रहा है । मोंह का अज्ञान इस चक्र को गतिमान किये ही रहेगा । इस मोंह से मुक्ति
का पथ ब्रम्ह की शरण ही है ।
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