त्रुटिपूर्ण बंधनकारी कर्मों को करते व्यक्ति निरंतर जन्म और
मृत्यु के चक्र में चलता ही जावेगा । यह रूप संसार इन्ही त्रुटिपूर्ण बंधनकारी
कर्मों को करने और उनके फल भोग के रूप में यातनाओं को भोगने का स्थल बना हुआ है ।
इस चक्र से मुक्ति सन्यास की दशा में कर्मों को करने से ही सम्भव है ।
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