गुरु बताये कि यदि व्यक्ति अपने उद्धार के लिये ब्रम्ह को
समर्पित भाव से पूजने का सही निर्णय कर लेता है तो उसका पूर्व का आचरण यदि पापयुक्त
भी है तो भी वह मुक्ति का योग्य पात्र बन जायेगा । प्रकृतीय मोंह में आसक्त होना
यह तो सामान्य प्रक्रिया है । इससे मुक्ति के लिये चेतना जागृत होना तथा किये जाने
वाले प्रयत्न के चुनाव में समर्पण का सही पथ अपनाना यह अधिक महत्वपूर्ण है ।
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