ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति आत्मा जब निम्नतर प्रकृति के साथ परस्पर, कंचिद उसके गुणों के भोग की कामना से करती
है, तो आसक्ति जनित होती है । इसके
विपरीत यदि आत्मा प्रकृति के साथ परस्पर,
मात्र अपने कर्तव्य दायित्व के निर्वाह के भाव से करती है, तो वह मोंह से मुक्त पथ पर होती है । इसाप्रकार प्रकृति का प्रकृति के प्रति भाव ही भेद है "मुक्ति" एवं "बंधन" ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें