रविवार, 3 जुलाई 2016

स्वतंत्रता

ब्रम्ह सभी कर्मों का कर्ता है परंतु स्वतंत्र है । उसकी उच्चतर प्रकृति आत्मा प्रकृतीय संसर्ग में रहते हुये प्रकृतीय मोंह में आसक्त हो प्रकृति की दासता को प्राप्त होती है । सन्यास की दशा में कर्म प्रेरण में संलग्न होना ही आत्मा की इस दासता से मुक्ति का उपाय होता है । इस सन्यास की दशा को पाने के लिये समस्त कर्मों को ब्रम्ह को अर्पित करके किया जाना पथ है । 

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