गुरू ने बताया कि बंधन कर्म के फल द्वारा सृजित होता है । इच्छा
जनित कर्म किसी विशिष्ट फल की प्राप्ति की कामना से किया जाता है इसलिये बंधनकारी
होता है । इसके विपरीत ब्रम्ह की सेवा में अर्पित कर्म होता है । हम कर्म को
ब्रम्ह की सेवा में कर रहे हैं । यह सन्यासी का कर्म है । मुक्तिदायक होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें