ज्ञान के जिज्ञासु साधक का लक्ष्य
कंचिद दिव्यरूप का दर्शन मात्र नहीं कहा जा सकता है । यह दर्शन यदि जिज्ञासु का
नित्य अनुभव बन जाय तब अभीष्ट की प्राप्ति मानी जावेगी । दिव्य रूप का दर्शन साधक
के चक्षुओं को खोल सकता है परंतु उन्हे व्यापक नहीं बना सकता है । माया के विस्तार
जिज्ञासु के मस्तिष्क में प्रकृतीय मोंह के जो चकाचौध सृजित करते हैं उनके शमन के
बिना जिज्ञासु को जो दर्शन का लाभ मिला वह क्षीण हो सकता है ।
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