गुरुवार, 16 मार्च 2017

नित्य अनुभव

ज्ञान के जिज्ञासु साधक का लक्ष्य कंचिद दिव्यरूप का दर्शन मात्र नहीं कहा जा सकता है । यह दर्शन यदि जिज्ञासु का नित्य अनुभव बन जाय तब अभीष्ट की प्राप्ति मानी जावेगी । दिव्य रूप का दर्शन साधक के चक्षुओं को खोल सकता है परंतु उन्हे व्यापक नहीं बना सकता है । माया के विस्तार जिज्ञासु के मस्तिष्क में प्रकृतीय मोंह के जो चकाचौध सृजित करते हैं उनके शमन के बिना जिज्ञासु को जो दर्शन का लाभ मिला वह क्षीण हो सकता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें