अर्जुन की विनय को स्वीकार करते
हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने, अपना पूर्व का स्वरूप धारण करते
हुये अर्जुन से कहा कि, हे अर्जुन मेरी कृपा से और मेरी
दैवीय शक्ति के माध्यम से ब्रम्ह के जिस दिव्य रूप जो कि, प्रकाशपुंज रूप है सर्वव्यापी है अनंत है और प्राचीनतम है का
साक्षात् दर्शन तुम्हे कराया गया, उस रूप का दर्शन आज़ तक अन्य किसी
को भी नहीं हुआ था ।
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