अर्जुन गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण के
विराट रूप के दर्शन से रोमांचित और भयभीत हो गया है और विनय करता है कि हे प्रभु
आप अपने सामान्य स्वरूप में पुन: स्थापित होने की कृपा करें । अर्जुन मोंह से
आच्छादित है । विनाशशील से मोंह और अविनाशी की विस्मृति दोनों एक दूसरे के पर्याय
हैं । जिस व्यक्ति को सत्य विस्मृत हो और उसी विस्मृत दशा में सत्य के विराट रूप
का दर्शन हो जाय तो भय साधारण प्रतिफल होगा । वही मनोदशा अर्जुन व्यक्त करते हुये
विनय करता है कि हे प्रभु आप अपने सामान्य स्वरूप को ग्रहण करें ।
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