गुरू द्वारा अनुग्रहपूर्वक जिज्ञासु
अर्जुन को अपने दिव्यरूप का दर्शन कराया गया । विश्वरूपदर्शन यह प्रगट करता है कि
ब्रम्ह वह धरातल है जिसपर सकल परिवर्तनशील रूप संसार उदय हो रहा है अस्त हो रहा है
। ब्रम्ह उस समुद्र के समान है जिसमें परिवर्तनशील रूपसंसार उठती हुई लहरों के
समान उभरता है लहरों के समान उसी समुंद्र में विलीन हो जाता है ।
इस प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता का
विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें