रविवार, 26 मार्च 2017

विश्वरूपदर्शन

गुरू द्वारा अनुग्रहपूर्वक जिज्ञासु अर्जुन को अपने दिव्यरूप का दर्शन कराया गया । विश्वरूपदर्शन यह प्रगट करता है कि ब्रम्ह वह धरातल है जिसपर सकल परिवर्तनशील रूप संसार उदय हो रहा है अस्त हो रहा है । ब्रम्ह उस समुद्र के समान है जिसमें परिवर्तनशील रूपसंसार उठती हुई लहरों के समान उभरता है लहरों के समान उसी समुंद्र में विलीन हो जाता है ।

इस प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता का विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।       

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