एक आदर्श भक्त की परिभाषा करते हुये
आचार्य शंकर बताये कि “एक आदर्श भक्त वह है जो कि अपने प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय, मस्तिष्क, विवेक और आत्मा द्वारा ब्रम्ह की अनुभूति करे” । वास्तविकता
में ब्रम्ह की सत्य अनुभूति ही उसका साक्षात्कार है । यही गुरू का उपदेश भी
निर्दिष्ट करता है और आचार्य की परिभाषा भी बताती है ।
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