व्याख्याकार
गुरू द्वारा बताये गये सन्यास की व्याख्या करते हुये कहता है कि सन्यास व्यक्ति के
अंत:करण के भाव से सम्बंधित होता है जिसके द्वारा व्यक्ति कर्म में प्रेरित होता
है,
कर्म करने की प्रेरणा ग्रहण करता है ना कि बाह्य कर्म द्वारा जो कि कर्म का मात्र
संचालन होता है ।
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