गुरू
द्वारा बताये गये अनुशासित कर्म की व्याख्या करते हुये व्याख्याकार कहता है कि
अनुशासित कर्म करने के लिये व्यक्ति को अंत:करण के भाव को नियंत्रित करना होग्ग ।
कर्म जब तक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया जावेगा तब तक बंधनकारी होगा । व्यक्ति
जब इच्छाओं का त्याग कर सकेगा तभी वह कर्म को कर्मफल की अपेक्षा से मुक्त होकर कर सकेगा
। इसीलिये गुरू ने उपदेश किया कि योग के लिये सन्यास अनिवार्य दशा है ।
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