गुरू
ने आत्मा को आत्मा का मित्र और शत्रु दोनो ही बताया और कहा कि आत्मा द्वारा ही
आत्मा का उत्थान सम्भव है । इस कथन का सार यह है कि आत्मा जब तक मोंह और अप्रिय के
मध्य है वह अपना ही शत्रु है । जब आत्मा इस मोंह और अप्रिय से अपने को अलग कर सत्य
के ध्यान की ओर उन्मुख हो जाती
है तो वह अपना उत्थान स्वयं करने में सक्षम हो जाती है ।
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