शरीर की रचना दो भिन्न अवयवों प्रकृति और आत्मा के संयोग से
हुई है । आत्मा उच्च स्तरीय होता है । प्रकृति गुणों की धारक होती है । आत्मा
भ्रमवश प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती
है । परिणामत: अपनी मौलिक स्वतंत्रता खो बैठती है । कंचिद यदि गुरू के उपदेश के
प्रभाव से मोंह ग्रसित आत्मा अपने को मोंह से मुक्त करने को सचेष्ट होती है तो
यह उसका मित्रवत् आचरण होगा । अन्यथा की स्थिति में मोंह बढते जावेंगे । यह
शत्रुवत् आचरण होगा ।
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