शनिवार, 29 अगस्त 2015

मित्रवत् और शत्रुवत् की व्याख्या

शरीर की रचना दो भिन्न अवयवों प्रकृति और आत्मा के संयोग से हुई है । आत्मा उच्च स्तरीय होता है । प्रकृति गुणों की धारक होती है । आत्मा भ्रमवश  प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती है । परिणामत: अपनी मौलिक स्वतंत्रता खो बैठती है । कंचिद यदि गुरू के उपदेश के प्रभाव से मोंह ग्रसित आत्मा अपने को मोंह से मुक्त करने को सचेष्ट होती है तो यह उसका मित्रवत् आचरण होगा । अन्यथा की स्थिति में मोंह बढते जावेंगे । यह शत्रुवत् आचरण होगा । 

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