जिस
संत को आत्मबोध हो जाता है वह स्वार्थ और अभिमान के कैद से मुक्त हो जाता है ।
उसका विवेक व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ प्रकृति के कर्ता स्वरूप को ग्रहण कर लेता है और वह प्रकृति की प्रेरणा
से कर्मों को कर हर्षित रहता है । वह प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह की अनुभूति करते
हुये प्रत्येक प्राणी को आदर भाव से व्यवहृत करता है । इस प्रकार आत्मा की
प्रधानता वाला जीवन जन-मानस के प्रति प्रेम और सौहार्द को बढाता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें