शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

सर्वभूतहितेरत:

जिस संत को आत्मबोध हो जाता है वह स्वार्थ और अभिमान के कैद से मुक्त हो जाता है । उसका विवेक व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठ प्रकृति के कर्ता स्वरूप  को ग्रहण कर लेता है और वह प्रकृति की प्रेरणा से कर्मों को कर हर्षित रहता है । वह प्रत्येक प्राणी में ब्रम्ह की अनुभूति करते हुये प्रत्येक प्राणी को आदर भाव से व्यवहृत करता है । इस प्रकार आत्मा की प्रधानता वाला जीवन जन-मानस के प्रति प्रेम और सौहार्द को बढाता है । 

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