गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य को जो भी सुख प्रकृतीय संसर्ग से
प्राप्त होता है वह मात्र दु:ख का साधन होता है । इन सभी सुखों का कोई प्रारम्भ और
कोई अंत नीयत होता है । इसलिये हे अर्जुन कोई भी ज्ञानी संत कभी भी इन प्रकृतीय
संसर्ग के सुखों में हर्षित नहीं होता है ।
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