सोमवार, 3 अगस्त 2015

अनित्य

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य को जो भी सुख प्रकृतीय संसर्ग से प्राप्त होता है वह मात्र दु:ख का साधन होता है । इन सभी सुखों का कोई प्रारम्भ और कोई अंत नीयत होता है । इसलिये हे अर्जुन कोई भी ज्ञानी संत कभी भी इन प्रकृतीय संसर्ग के सुखों में हर्षित नहीं होता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें