गुरू
के द्वारा बताये गये कर्म करने के कारण का स्वरूप की व्याख्या
करते हुये बताया गया कि आत्मा की यथास्थिति उसके कर्म सम्पादन की गुणवत्ता द्वारा
ही परीक्षित की जा सकती है । आत्मा पर आच्छादित मोंह के निवारण के प्रयत्न भी कर्म
के मार्ग से ही आत्मा की शुद्धि के लिये प्रयोग किये जाते है । मोंह से मुक्त
आत्मा ही कार्य के परिणाम से सम्बंध रखे बगैर कार्य सम्पादन कर सकती है । अन्यथा
की परिस्थिति में कर्म फल की उद्विग्नता प्रतिपल विद्यमान रहेगी ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें