शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

मौलिक स्वरूप की व्याख्या

आत्मा परम् ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति है । निम्नतर-प्रकृति के मध्य रहते, प्रकृतीय गुणों का भोग करते आत्मा प्रकृतीय गुणों में आसक्त हो जाती है । गुरू का कथन यह बताता है कि आत्मा में वह क्षमता है कि वह प्रकृतीय गुणों के आच्छादन से मुक्त हो स्वतंत्र स्वरूप में रह सकती है । परंतु अज्ञानवश ऐसा होता नहीं । आत्मा मोंह में बँधी ही रहती है । परंतु यह स्थिति आत्मा के हित में नहीं होती है । इसलिये गुरू शिष्य को अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर होने को प्रेरित करते हैं । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें