गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति बाह्य वस्तुओं से अपने मस्तिष्क
को पूर्णरूप से हटाकर, अपनी दृष्टि को अपनी दोनो भौहो के मध्य केंद्रित कर, अपने नाक
में चलने वाली दोनो प्रकार की वायु (अंदर आती और बाहर जाती) को नाक के अंदर ही
सीमित कर,
जिसका मस्तिष्क और विवेक पूर्ण नियंत्रण में है, जिसने इंद्रियों को पूर्ण वश में किया
हुआ है,
जिसने इच्छा क्रोध भय से मुक्ति पा ली है ऐसा व्यक्ति जब पूर्ण निष्ठा से मुक्ति
के लिये प्रयत्नशील होता है तो वह ब्रम्ह के साथ पूर्ण युक्त हो जाता है ।
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