गुरुवार, 6 अगस्त 2015

पूर्णता का स्वरूप

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस संत ने अपने समस्त पापों का नाश कर लिया है, जिसके मस्तिष्क में द्वैत का भेद सदैव स्पष्ट रहता है, जिसका मस्तिष्क सदैव शाश्वत विवेक के अधीन अनुशासित कार्य करता है, जो सर्वहिताय कार्य करने में रूचि लेता है वह योगी ब्रम्ह की दिव्य शांति का भोग करता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें