गुरू
द्वारा बताये गये आत्मा का स्वरूप बोध, हम सभी के लिये बाधित अवस्था में होता
है । इस बाधा का विस्तार व्याख्याकार बताता है कि हम सभी की सकल व्यस्तता मोंह और
अप्रिय में सीमित है । कंचिद हम अपने मस्तिष्क पर छाये मोंह और अप्रिय के भ्रामक
आवरण को हटा सकें तो हम अपने अंदर विद्यमान ब्रम्ह के अंश आत्मा का अनुभव कर
सकेंगे । हमारी आत्मा जब तक इस मोंह और अप्रिय के मध्य रहती है वह अपने ही स्वरूप
से अनभिज्ञ रहती है ।
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