भगवद्गीता
सोमवार, 24 अगस्त 2015
अन्य दृष्टांत
भागवद्गीता में गुरू द्वारा बताये गये
“
आत्मा ही आत्मा का मित्र भी हो सकता है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु भी हो सकता है” के अनुरूप धम्मपद में कहा गया है कि “आत्मा ही आत्मा का स्वामी होता है” तथा “आत्मा ही आत्मा का लक्ष्य होता है” ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें