गुरू ने योग की अवस्था पाने के लिये प्रथम अनिवार्य दशा के रूप
में सम्पूर्ण इच्छाओं का परित्याग बताया । वह इच्छायें जो इंद्रीय वासनाओं की
पूर्ति के निमित्त पैदा हुई हैं अथवा प्रकृतीय गुणों के सम्मोहन द्वारा जागृत हुई
हैं । इनके रहते मस्तिष्क ब्रम्ह की ओर अग्रसर हो ही नहीं सकता है । दूसरी
अनिवार्य दशा गुरू ने समस्त इंद्रियों को
मस्तिष्क के नियंत्रण में रखने की बतायी है । इससे साधना अवधि में नये विकार का
जन्म सम्भव नहीं होगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें