गुरू द्वारा योग की उत्कर्ष स्थिति बताने में मस्तिष्क की दशा
शांत (विचारों के स्थगन से) और केंद्रित (आत्म-चिंतन में) को विषेस महत्वपूर्ण
बताया है । यह स्थिति प्रकृति निर्मित मस्तिष्क के लिये है इसलिये अभ्यास द्वारा
प्राप्त की जाने वाली है । गुरू ने दूसरी बात कही है आत्मा द्वारा आत्मा का
नियंत्रण और आत्मा का आत्म-सुख में हर्षित रहना जो कि अनुभव के क्षेत्र के हैं ।
इस भाग को वही व्यक्ति साध्य बना सकेगा जिसे आत्मा का अनुभव प्राप्त हो गया है ।
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