सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

ब्रम्हसमाहित की व्याख्या

गुरू का कथन व्यक्ति के मस्तिष्क के भाव से सम्बन्ध रख्ता है । जिस व्यक्ति के मस्तिष्क में ब्रम्हचेतना सतत् स्थिर रहती  है उसका अहंकार क्षीण हो जाता है । कार्य तो वह प्रकृति की अपेक्षानुसार करेगा ही परंतु उसे ब्रम्ह की मर्यादा का स्मरण सतत् विद्यमान रहने से वह कर्तापन के भाव से मुक्त रहेगा और ब्रम्ह के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेगा । 

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