मोंह से ग्रसित व्यक्ति के मस्तिष्क की समस्त व्यस्तता इंद्रीय
वासना वस्तुओं की पूर्ति, संचय एवं रक्षा में ही रहती है तथा प्रकृतीय गुणों के अधीन कार्यों को नियोजित करने में रहती है । इसलिये गुरू के
द्वारा बताये गये चरण 1 के उपदेश यथा इच्छाओं के त्याग एवं इंद्रियों के नियंत्रण के क्रियांवन के फल से मस्तिष्क की व्यस्तता
क्षीण होगी और तत्फलम् शांति का अनुभव आयेगा और इस शांत स्थित के मस्तिष्क को
ब्रम्ह के ध्यान में व्यस्त करने का गुरू ने योग साधना के दूसरे चरण में उपदेश किया है ।
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